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LUCKNOW. वह सुबह भी उनके लिए सामान्य दिनों की सुबह जैसी थी,जब तक कि उनको अपने बेटे छन्नू के जिला अस्पताल में भर्ती होने की खबर नहीं मिली.2 पुलिसवालों ने जैसे ही खबर दी उनकी सुबह की रंगत उतर गई. छन्नू पुलिस से मुठभेड़ में घायल हो गया था.वह अस्पताल पहुंचे तो पता चला उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं है.
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है.उत्तर प्रदेश पुलिस की पिछले 1 साल में की गई लगभग साढे ग्यारह सौ मुठभेड़ में मारे गए 44 अपराधियों में से ही एक की कहानी है.पुलिस वालों ने उसको अमरूद की बाग से उठा लिया था.फिर जो वापस घर पहुंची वह छन्नू की लाश थी.अपराधी रहा हो या नहीं पर क्या उसको मार देना अपराध खत्म करने के लिए उचित था, कहीं ऐसा तो नहीं कि उत्तर प्रदेश पुलिस सरकार की छूट का दुरुपयोग कर रही है? क्या व्यक्तिगत मसलों को मुठभेड़ की आड़ में सुलझाया जा रहा है?
महात्मा बुद्ध ने कहा था"पाप से घृणा करो पापी से नहीं" पर यहां तो पाप को खत्म करने के नाम पर कहीं पापियों को ही मार दिया जा रहा है, तो कहीं बेगुनाहों को भी शिकार बनाया जा रहा है. जिसका प्रभाव समाज पर विपरीत भी पड़ सकता है.
इन सारे सवालों और घटनाओं के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग ने फर्जी मुठभेड़ पर जांच बैठा दी है. विधानसभा में भी विपक्षी दलों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई है.
पर सवाल जस का तस है.क्या इस तरह से पूर्व नियोजित तरीके से फर्जी एनकाउंटर में पुलिस अपराधियों को मारकर खुद कानून की नजर में अपराध तो नहीं कर रही है?

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