दरअसल हमारे देश की अदालतों में एक परंपरा रही है कि जब भी कोई वक़ील किसी भी कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत होता है तो जज को माय लार्ड या योर लार्डशिप कहकर संबोधित करते हैं।लेकिन 14 जुलाई को राजस्थान हाईकोर्ट में सर्वसम्मति से यह फ़ैसला लिया गया है कि आगे से अदालत में वक़ील न्यायाधीश को इन शब्दों द्वारा संबोधित करने से बचे.हाईकोर्ट ने कहा कि सर श्रीमान या सम्मान से चाहे तो किसी भी शब्द का इस्तेमाल करिए पर इन शब्दों के इस्तेमाल से बचें। ग़ौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश एस रविंद्र भट्ट के कार्यकाल में हुई पूर्ण पीठ की पहली बैठक रविवार को हुई।इस दौरान जोधपुर पीठ के न्यायाधीशों ने हिस्सा लिया था।और यह निर्णय लिया कि संविधान में निहित समानता के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए न्यायाधीशों को मी लार्ड कह कर संबोधित करना सही नहीं है।
इन शब्दों से संबोधनों पर विवाद बहुत पहले से चला आ रहा है।
इन संबोधनों के द्वारा जज को बुलाया जाना औपनिवेशिक पदों के अवशेष के रूप में माना जाता है।जो दूसरे शब्दों में ग़ुलामी का प्रतीक है इससे पहले देश की तमाम बार काउंसिल ने प्रस्ताव पारित करके कहा भी है कि वो my lord या योर लॉर्डशिप जैसे शब्दों का इस्तेमाल संबोधन के लिए नहीं करेंगे।ऐसा ही एक मामला 2009 में मद्रास हाईकोर्ट में सामने आया जब वहाँ के जज जस्टिस चंद्रु ने अपने कोर्ट में इन शब्दों के इस्तेमाल को बैन कर दिया था।मई 2014 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एच एल दत्तु और जस्टिस एस ए बोबड़े ने एडवोकेट शिवसागर तिवारी की दायर की गई जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा था कि my lord और your lordship जैसे शब्दों का इस्तेमाल अनिवार्य नहीं है।वक़ील अपनी इच्छानुसार sir श्रीमान my lord और your lordship जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं,बस वो जिन भी शब्दों का इस्तेमाल करें उन्हें सम्मान के साथ इस्तेमाल करें।
लेकिन इसके उलट उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाई कोर्ट में बीते अप्रैल एक आदेश जारी हुआ है जिसमें हाईकोर्ट ने अपने अफ़सरों को आदेश दिया कि वे जब भी जजों को कोर्ट की गैलरी से निकलता देखें तो आदरपूर्वक रुकें और उन्हें सम्मान दें।कोर्ट ने कहा था कि आदेश के बाद अधिकारियों की किसी भी तरह की चूक को गंभीरता से लिया जाएगा।अलग अलग विचारों की भरमार होने के बाद भी ऐसे फ़ैसले जिनमे समानता की बात हो।ऐसे फ़ैसले जिनमे बदलते वक़्त के साथ बदलने की बात हो सुकून भरे लगते हैं।

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