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Sunday, 14 July 2019

सनी देवोल को कोर्ट के इस आदेश के बाद बदलना पड़ता अपना तारीख पे तारीख वाला डायलाग ।

दामिनी पिक्चर वाले सनी देओल  याद  हैं?अगर 14 जुलाई के बाद उनका  कोई केस राजस्थान हाईकोर्ट में फँसता उनको बार बार तारीख़ पर तारीख़ मिलती,और उनको ग़ुस्सा आ जाता तो उनकी बोली गई तारीख़ पे तारीख़ वाली लाइनें  थोड़ा बदल जाती।उसमें से उनका अलग अन्दाज़ में बोला गया मई लार्ड हटाना पड़ता।


दरअसल हमारे देश की अदालतों में एक परंपरा रही है कि जब भी कोई वक़ील किसी भी कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत होता है तो जज को माय  लार्ड  या योर लार्डशिप  कहकर संबोधित करते हैं।लेकिन 14 जुलाई को राजस्थान हाईकोर्ट में सर्वसम्मति से यह फ़ैसला लिया गया है कि आगे से अदालत में वक़ील न्यायाधीश को इन शब्दों द्वारा संबोधित करने से बचे.हाईकोर्ट ने कहा कि सर  श्रीमान या सम्मान से चाहे तो किसी भी शब्द का इस्तेमाल करिए पर इन शब्दों के इस्तेमाल से बचें। ग़ौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश एस रविंद्र भट्ट के कार्यकाल में हुई पूर्ण पीठ की पहली बैठक रविवार को हुई।इस दौरान जोधपुर पीठ के न्यायाधीशों ने हिस्सा लिया था।और  यह निर्णय लिया कि संविधान में निहित समानता के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए न्यायाधीशों को मी लार्ड  कह कर संबोधित करना सही नहीं है।

इन शब्दों से संबोधनों पर विवाद बहुत पहले से चला आ रहा है।
इन संबोधनों के द्वारा जज को बुलाया जाना औपनिवेशिक पदों के अवशेष के रूप में माना जाता है।जो दूसरे शब्दों में ग़ुलामी का प्रतीक है इससे पहले देश की तमाम बार काउंसिल ने प्रस्ताव पारित करके कहा भी है कि वो my lord  या योर लॉर्डशिप जैसे शब्दों का इस्तेमाल संबोधन के लिए नहीं करेंगे।ऐसा ही एक मामला 2009 में मद्रास हाईकोर्ट में सामने आया जब वहाँ के जज जस्टिस चंद्रु ने अपने कोर्ट में इन शब्दों के इस्तेमाल को बैन कर दिया था।मई 2014 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एच एल  दत्तु और जस्टिस एस ए बोबड़े  ने एडवोकेट शिवसागर तिवारी की दायर की गई जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा था कि my lord और your lordship  जैसे शब्दों का इस्तेमाल अनिवार्य नहीं है।वक़ील अपनी इच्छानुसार sir श्रीमान my lord और your lordship जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं,बस वो जिन भी शब्दों का इस्तेमाल करें उन्हें सम्मान के साथ इस्तेमाल करें।

लेकिन इसके उलट उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाई कोर्ट में बीते अप्रैल एक आदेश जारी हुआ है जिसमें हाईकोर्ट ने अपने अफ़सरों को आदेश दिया कि वे जब भी जजों को कोर्ट की गैलरी से निकलता देखें तो आदरपूर्वक रुकें और उन्हें सम्मान दें।कोर्ट ने कहा था कि आदेश के बाद अधिकारियों की किसी भी तरह की चूक को गंभीरता से लिया जाएगा।अलग अलग विचारों की भरमार होने के बाद भी ऐसे फ़ैसले जिनमे समानता की बात हो।ऐसे फ़ैसले जिनमे बदलते वक़्त के साथ बदलने की बात हो सुकून भरे लगते हैं।

Monday, 23 April 2018

लखनऊ की झुग्गियों में स्वास्थ्य सुविधाएं।


लखनऊ की झुग्गियों में स्वास्थ्य सुविधाएं

 कूड़ा  किसी के लिए बीमारी तो किसी के लिए जीवन यापन का साधन.किसी के लिए बदबू तो किसी के लिए उसमें से आती खाने की खुशबू.  कूड़ा  जो हम अपने घर से समेट कर बाहर फेंकते हैं, झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले  कूड़ा बीनने वाले लोग उसमें अपने उपयोग के सामान तलाश कर उन्हें बेचकर अपने 2 जून की रोटी का इंतजाम करते हैं.
हमने झुग्गियों की हालात के बारे में गहराई से जानने के लिए वहां जाने का फैसला किया. हमारे मन में बहुत सारे सवाल थे कि आखिर जो चीजें हमारी बीमारी की वजह बनती हैं, कैसे उसमें यह अपनी जिंदगी तलाश कर जी रहे हैं? क्या यह लोग बीमार नहीं होते ?यह बीमार होते हैं तो यह स्वास्थ्य सेवाएं कहां से लेते हैं?  क्या इन तक स्वास्थ्य सेवाएं पर्याप्त मात्रा में पहुंच रही होती हैं?

 

हमने देखा कि कैसे इस कूड़े में कुछ जिंदगियां तबाह हो रही हैं, तो कुछ इस कूड़े के सहारे अपने आगे के जीवन के सफर को आसान बनाने की जुगत में लगे हुए हैं. न जाने कितने बचपन इन झोपड़ियों में बर्बाद हो रहे हैं. तो न जाने कितने युवा यहां की कमाई से अपनी जिंदगी को एक नया रूप देने की राह पर चल पड़े हैं. इन सबके बीच यहां की बदतर हालात का जो सबसे बड़ा शिकार है वह मासूम बचपन है.

Sunday, 1 April 2018

बिछड़ता बचपन-मिलती जवानी,इससे गुजरे हर लड़के की कहानी।


आइए समझते हैं एक लड़के की  बचपन से  जवानी की ओर बढ़ती  उम्र के साथ उसके अंदर आए बदलाव को।  बदलते वक्त के साथ लिखी उसकी कुछ पंक्तियों से।
जब उसका सिर्फ एक जान से प्यारा दोस्त होता है-
                   
                      मेरी हंसी है तू मेरी खुशी है तू।
                      यार ही नहीं मेरी जिंदगी है तू।

फिर उसे इश्क का कीड़ा काटता है-

  तपती दोपहरी में पेड़ की छाया सा सुकून मिलता है तुम्हें        सोच कर।
  शायद खुदा ने ही मिलाया है हमें इस दुनिया की भीड़ में          खोज कर।

फिर वो कीड़ा उसकी जिंदगी में जहर घोल कर चला जाता है-
                   

       हम यूंही नहीं भूलेंगे ये जो गम उसके जाने का है।
      आखिर चुकाना जो कर्ज कुछ पल मुस्कुराने का है।

और फिर वह जिंदगी की जद्दोजहद में उलझ जाता है-


         जिंदगी उलझी हुई डोर के जैसी होती जा रही है।
           जितना  सुलझाओ उतना उलझती जा रही है।

हिंदू-मुसलमान धार्मिक कट्टरता नहीं,राजनीतिक कट्टरता के शिकार।


LUCKNOW.हमारे देश में पिछले कुछ दिनों से धार्मिक कट्टरता का नंगा नाच जोरों से चल रहा है। चाहे वह पश्चिम बंगाल हो या फिर बिहार। लोगों की जाने जा रही हैं, और हमारे नेता इन मौतों पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। सियासी बयानबाजियों का भी माहौल गर्म है। ऐसे में हमें अपनी राजनीतिक और धार्मिक समझ बढ़ाने की आवश्यकता है। हमें यह समझना होगा हिंदू मुसलमान एक दूसरे के दुश्मन नहीं हैं। बल्कि राजनीतिक पार्टियां अपने लाभ के लिए धर्म के नाम पर हमें भड़का रही हैं। असल में यह  मौतें धार्मिक कट्टरता नहीं बल्कि गंदी राजनीति का नतीजा हैं।
धार्मिक कट्टरता के विषय में गणेश शंकर विद्यार्थी का एक कथन उल्लेखनीय है। वह  कहते थे  कि

          "मैं हिंदू मुसलमानों के झगड़े का मूल कारण इलेक्शन आदि को समझता हूं।"

साथ ही उनके द्वारा हिंदू मुस्लिम कट्टरता को लेकर की गई कुछ आलोचनाएं भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने हिंदू कट्टरता के लिए के लिए कहा था कि-

       "कुछ लोग हिंदू राष्ट्र-हिंदू राष्ट्र चिल्लाते हैं। हमें क्षमा किया जाए यदि हम कहें नहीं। हम इस बात पर ज़ोर दें कि वे एक बड़ी भारी भूल कर रहे हैं और उन्होंने अभी तक राष्ट्र शब्द के अर्थ ही नहीं समझा। हम भविष्य वक्ता नहीं पर अवस्था हमसे कहती है कि अब संसार में हिंदू राष्ट्र नहीं हो सकता।"

और कुछ इसी तरह उन्होंने मुस्लिम कट्टरता के लिए भी कहा था-

"वे लोग भी इसी प्रकार की भूल कर रहे हैं जो टर्की या काबुल, मक्का या जेद्दा का स्वप्न देखते हैं, क्योंकि वे उनकी जन्मभूमि नहीं और इसमें कुछ भी कटुता न समझी जानी चाहिए यदि हम ये कहें कि उनकी क़ब्रें इसी देश में बनेंगी और उनके मर्सिये इसी देश में गाए जाएंगे।."

इनके द्वारा कही गई इन बातों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। चाहे वह कट्टरता को बढ़ावा दे रही राजनीति हो या हमारी धार्मिक कट्टरता को बढ़ाती हमारी खुद की सोच। यह कथन हमारी सोच को आईना दिखाते हैं। आज जिस तरह से देश में धार्मिक कट्टरता दिन ब दिन बढ़ती जा रही है, यह हमारे भविष्य के लिए अच्छी खबर नहीं है। हमें दूसरा पाकिस्तान बनने से बचना होगा।हमें  आपस में नहीं एक दूसरे के लिये लड़ने की जरूरत है।

Saturday, 31 March 2018

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूसरी किताब "स्कैम वारियर्स" जल्द ही होगी लॉन्च



LUCKNOW. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लिखी गई दूसरी किताब "स्कैम वारियर्स" के जल्द ही लॉन्च होने के संकेत मिले हैं।जहां उन्होंने अपनी पहली किताब "एग्जाम वारियर्स" बच्चों से परीक्षा के तनाव को दूर करने के लिए लिखी थी। वहीं लोगों ने उम्मीद जताई है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी अपनी दूसरी पुस्तक परीक्षाओं के बाद  उनमें सामने  आने वाले स्कैम पर लिखेंगे। जिससे कि बच्चे तनाव से बच सकें और वह आगे की परीक्षाओं में  स्कैम  के लिए तैयार रहें। यह पुस्तक उन सभी छात्रों के लिए मददगार साबित होगी  जो इन घोटालों से बहुत ज्यादा परेशान हैं।सूत्रों से खबर मिली है इस किताब के  आवरण पृष्ठ पर स्कैम के विरुद्ध में धरना कर रहे लड़कों की लाठियों से  पिटने  की  तस्वीर होगी।वहीं आवरण पर ही मोदी जी की भी तस्वीर होगी जिसमें उनके हाथों में लाठी होगी।
साथ ही सूत्रों ने बताया कि मोदी जी अपने अगले मन की बात कार्यक्रम में  घोटालों से परेशान छात्रों के लिए चिंता भी व्यक्त करेंगे।उनका मानना है कि घोटाले परीक्षार्थियों की सहनशक्ति जांचने का एक अच्छा तरीका है इसलिए परीक्षार्थी परेशान ना हों। उन्होंने चिंताओं को दूर करने के लिए हर साल  "स्कैम उत्सव" मनाने की अपील भी करने की सोची है।
जिसमें घोटालों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जाए। जिससे घोटालों के लिए बैठा छात्रों के मन में भय दूर हो जाए। स्कैम पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन हो। छात्रों को यह भी समझाया जाए कि उनकी पढ़ाई हर हाल में बेकार ही जाएगी। इसलिए तनाव ना लें।
 उनका लक्ष्य पिछली किताब की तरह ही इस किताब में भी छात्रों को स्कैम के प्रति  "वारियर" यानी योद्धा बनने का संदेश देना होगा।

Friday, 30 March 2018

विश्व के सबसे युवा देश में रोजगार की बदतर हालत

LUCKNOW.हमारा भारत  वो देश जिसकी युवा आबादी विश्व के किसी भी और देश से ज्यादा है.जहां हर साल लगभग सवा करोड़ रोजगार योग्य युवा तैयार हो रहे हैं.वहां नौकरियों की हालत दिन ब दिन बदतर होती जा रही है.सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रियायें पिछले कुछ सालों में लगातार विवाद का कारण बन रही हैं. हाल ही में प्रकाश मे आये SSC घोटाले को देख कर तो ऐसा लगता है ,कि पढ़ने से बेहतर युवा पैसों का इंतजाम करें और लाखों मे बिक रही नौकरियों को खरीद लें.सालों से जी जान लगा कर मेहनत कर रहे युवावों के लिये ये हतास करने वाले हालात हैं.
विभिन्न विभागों मे लाखों रिक्तियां हैं जिनपर नियुक्तियों की आवश्यकता के बावजूद भी भर्तीयां नही की जा रही हैं.जिन विभागों मे रिक्तियों के लिए परीक्षायें करायी जा रही, उनमें ज्यादातर मामले कहीं न कहीं विवादित हो जा रहे हैं.
रेलवे,बैंकिंग,शिक्षा समेत विभिन्न विभागों में लाखों भर्तियां लंबित हैं.कहीं सालों से परिणाम रुके हैं तो कहीं नियुक्तियां.
यंहा तक की UPSC के द्वारा की जाने वाली अफसरों की भर्तियों में भी काफी कमी आयी है. जहां 2014 में 1291 पदों की विज्ञप्ति थी वही 2017 में 40% घटकर 782 बची है.
 जहां पिछले कई सालों से विभिन्न विभागों में लाखों पद रिक्त है, जिन पर भर्तियों की आवश्यकता है. वहीं केंद्र सरकार ने  पिछले 5 सालों से अधिक वक्त से रिक्त पड़े पदों को समाप्त करने के संकेत दिए हैं.
  ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि रोजगार देने के नाम पर सरकार निजी कंपनियों को कर में भारी छूट दे रही है, लेकिन उसके बाद भी निजी कंपनियों में नौकरियों की संख्या दिन ब दिन घटती ही जा रही है.60% से  अधिक इंजीनियरिंग स्नातक बेरोजगार है। वही IT कंपनियों में लगातार कर्मचारियों की छंटनी की जा रही है.

Thursday, 22 March 2018

क्या फर्जी एनकाउंटर में पुलिस अपराधियों को मारकर खुद कर रही अपराध?



LUCKNOW. वह सुबह भी उनके लिए सामान्य दिनों की सुबह जैसी थी,जब तक कि उनको अपने बेटे छन्नू के जिला अस्पताल में भर्ती होने की खबर नहीं मिली.2 पुलिसवालों ने जैसे ही खबर दी उनकी सुबह की रंगत उतर गई. छन्नू पुलिस से मुठभेड़ में घायल हो गया था.वह अस्पताल पहुंचे तो पता चला उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं है.

यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है.उत्तर प्रदेश पुलिस की पिछले 1 साल में की गई लगभग साढे ग्यारह सौ मुठभेड़ में मारे गए 44 अपराधियों में से  ही एक की कहानी है.पुलिस वालों ने उसको अमरूद की बाग से उठा लिया था.फिर जो वापस घर पहुंची वह छन्नू की लाश थी.अपराधी रहा हो या नहीं पर क्या उसको मार देना अपराध खत्म करने के लिए उचित था, कहीं ऐसा तो नहीं कि उत्तर प्रदेश पुलिस सरकार की छूट का दुरुपयोग कर रही है? क्या व्यक्तिगत मसलों को मुठभेड़ की आड़ में सुलझाया जा रहा है?
 महात्मा बुद्ध ने कहा था"पाप से घृणा करो पापी से नहीं" पर यहां तो पाप को खत्म करने के नाम पर कहीं पापियों को ही मार दिया जा रहा है, तो कहीं बेगुनाहों को भी शिकार बनाया जा रहा है. जिसका प्रभाव समाज पर विपरीत भी पड़ सकता है.
इन सारे सवालों और घटनाओं के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग ने फर्जी मुठभेड़ पर जांच बैठा दी है. विधानसभा में भी विपक्षी दलों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई है.
पर सवाल जस का तस है.क्या इस तरह से पूर्व नियोजित तरीके से  फर्जी एनकाउंटर में पुलिस अपराधियों को मारकर खुद कानून की नजर में अपराध तो नहीं कर रही है?

सनी देवोल को कोर्ट के इस आदेश के बाद बदलना पड़ता अपना तारीख पे तारीख वाला डायलाग ।

दामिनी पिक्चर वाले सनी देओल  याद  हैं?अगर 14 जुलाई के बाद उनका  कोई केस राजस्थान हाईकोर्ट में फँसता उनको बार बार तारीख़ पर तारीख़ मिलती,और उ...

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