आइए समझते हैं एक लड़के की बचपन से जवानी की ओर बढ़ती उम्र के साथ उसके अंदर आए बदलाव को। बदलते वक्त के साथ लिखी उसकी कुछ पंक्तियों से।
जब उसका सिर्फ एक जान से प्यारा दोस्त होता है-
मेरी हंसी है तू मेरी खुशी है तू।
यार ही नहीं मेरी जिंदगी है तू।
फिर उसे इश्क का कीड़ा काटता है-
तपती दोपहरी में पेड़ की छाया सा सुकून मिलता है तुम्हें सोच कर।
शायद खुदा ने ही मिलाया है हमें इस दुनिया की भीड़ में खोज कर।
फिर वो कीड़ा उसकी जिंदगी में जहर घोल कर चला जाता है-

हम यूंही नहीं भूलेंगे ये जो गम उसके जाने का है।
आखिर चुकाना जो कर्ज कुछ पल मुस्कुराने का है।
और फिर वह जिंदगी की जद्दोजहद में उलझ जाता है-
जिंदगी उलझी हुई डोर के जैसी होती जा रही है।
जितना सुलझाओ उतना उलझती जा रही है।



No comments:
Post a Comment